रविवार, 16 जुलाई 2017

BAT PIPAL KI CHOUKI QUE-ANS

🙏प्रणाम जी 🙏

🌷रूह आज बट पीपल की चौकी में रमण करना चाहती हैं तो प्यारी रूह के दिल में इच्छा उपजते ही धाम धनी हक़ श्री राज जी रूह की सुरता को बट पीपल की चौकी में खड़ा कर देते हैं --बट पीपल की चौकी में हैं रूह  तो रंगमहल की किस दिशा में वह खुद को देखती हैं❓

दक्षिण दिशा 

🌷रंगमहल के अग्नि कोण और नैरत्य कोण के मध्य 1500  मंदिर आएं हैं और 50  हान्स आएं हैं  ,धाम के अति सुन्दर झिलमिलाते मंदिर और मंदिरों के बाहिरी और धाम रोंस --धाम रोंस से हान्स -हान्स से सीढ़ियां उतरी हैं ।यह सीढ़ियां चांदों से उतरी हैं ।धाम चबूतरा के साथ ही एक चबूतरा आया हैं उसके दोनों और से सीढ़ियां उतरी हैं ,रूह इन सीढ़ियों से जब निचे उतरती हैं तो सीढ़ियों की कोमलता ,नरमाई ,चेतनता ,सुगन्धि महसूस करती हैं --सीढ़ियों पर बिछी गिलम अत्यंत कोमल हैं और गिलम पर अद्भुत नक्काशी आयीं हैं --सीढ़ियां उतरते समय रूह धाम की तरफ देखती हैं तो वहां धाम की नूरी दीवार के दर्शन होते हैं ,दीवार पर चित्रामन के पशु पक्षी भी मानो रूह के संग कदम से कदम मिला उतर रहे हैं और वन की तरफ रूह देखती हैं तो सीढ़ियों पर आएं फूलों से जड़ित कठेड़ा हैं और आगे नजर करेगी रूह तो क्या नज़रों में शोभा आएगी --किन पक्ष की अलौकिक शोभा रूह सीढ़ियां उतरते उतरते देख रही हैं ❓

बट पीपल की चौकी 

🌷हक़ श्री राज जी की निसबती प्यारी रूहें उमंग उल्लास से लबरेज जब सीढ़ियां उतर कर नीचे वाली रोंस पर आती हैं तो देख रही हैं धाम चबूतरा से लगती इन रोंस की मनोहारी शोभा --हान्स हान्स से उतरती बेशुमार रंगों से सजी चांदों से उतरती धाम की बादशाही शोभा लिए सीढ़ियां इन रोंस पर आयीं हैं --इन रोंस से साथ एक रूप मिलान करता हुआ बट पीपल की चौकी का पहला नहर का चबूतरा हैं --इन आड़े नहर के चबूतरा की शोभा रूहें निहार रही हैं ,अति सुन्दर शोभा तो वह शोभा कैसे हैं जो रूह ने देखी ❓

बट पीपल की चौकी के आड़े खड़े नहर के चबूतरा मनोहारी शोभा लिए हैं --एक मंदिर के चबूतरा में मध्य में 50  हाथ की जगह में उज्जवल ,शीतल ,निर्मल जल की नहर सुशोभित हैं और दोनों और 25 -25 नूरी रोंस (सड़क) की शोभा हैं 

🌷धाम चबूतरे के साथ साथ 1500  मंदिर के लम्बे आड़े चबूतरा  रूह देख रही हैं ,तो यह चबूतरा कितने कितने  मंदिर दुरी से आएं हैं और कितने आएं हैं❓

सौ मंदिर 
100-100 मंदिर के अंतर से छः आड़े नहर के चबूतरा आएं हैं


🌷आड़े खड़े नहर के चबूतरों के मध्य सुन्दर चौक बने हैं ,पांच चौकों की कितनी हार रूह को दिख रही हैं ❓

15 हार

🌷रूह एक चौक में हैं ,100  मंदिर का लम्बा चौड़ा सुन्दर चौक--चौक के चारों दिशा और कोनों में क्या शोभा रूह देखती हैं ❓

रूह एक चौक में खुद को महसूस कर रही हैं ,चौक के चरों दिशा में नेहरे हैं और चारों कोनों में चहबच्चे 

🌷चौक के ठीक मध्य में चबूतरा आया हैं कमर भर ऊंचा --रूह देख रही हैं इन चबूतरा की शोभा --चबूतरा कैसे और कितनी लम्बाई चौड़ाई का हैं ❓

इन नूरी चौक के ठीक मध्य भाग में 33  मंदिर का लम्बा चौड़ा चबूतरा आया हैं हिस्की चारों दिशा से आठ मंदिर की जगह ले कर तीन तीन सीढ़ियां चौक में उतरी हैं और घेर कर फूलों का कठेड़ा शोभित हैं 

🌷चबूतरा को घेर कर चौक में उज्जवल अति कोमल रेती बिछी हैं और चबूतरा के ठीक मध्य क्या शोभा हैं जो रूह ने देखी ❓

     चबूतरा के ठीक मध्य वृक्ष की शोभा हैं --एक मंदिर का नूरी तना प्रगट हो कर 75 हाथ सीधा जा कर फिर डालियाँ बढ़ाता हैं और वृक्ष आपस में एक रूप मिलाब कर फूलों पत्तियों की सुन्दर चन्द्रवा (छत )करते हैं                  

🌷बट पीपल की चौकी के चौकों में चबूतरों पर वृक्ष आएं हैं यह वृक्ष कौन कौन से हैं जो रूह देख रही हैं❓

एक बट का एक पीपल इस क्रम से वृक्ष आएं हैं 

🌷चौकी की नूरी वृक्षों की डालियाँ मेहराब बना कर आपस में मिलान करती हैं इन मेहराबों में अति सुन्दर हिंडोलों की शोभा हैं आप श्री राज जी श्री श्यामा जी और सखियाँ इन हिंडोलों में झूलते हैं उन समय जब ऊपर हिंडोले झूम रहे हैं तो नीचे क्या शोभा हैं जो रूह को प्रिय लग रही हैं ❓

रूह जब आप श्री राज जी श्री श्यामा जी के संग चौकी में हिंडोलों में झूलती हैं तो नीचे नेहेरें हैं और चेहेबच्चों से नूरी जल की बुँदियाँ उछल रही हैं 

🌷आडी खड़ी नहरों के मध्य चौक बने हैं चौक के चारों कोनों पर अति मनोहारी जल कुंड चहबच्चे आएं हैं जिनसे पांच पांच फुहारें छूटते हैं ये कुल कितने चहबच्चे हैं ❓

100 चहबच्चे    
                 
🌷वृक्षों की मेहराबों में हिंडोले आएं हैं तो बट पीपल की चौकी की चारों भोम में कुल कितने हिंडोले हुए ❓

 पांच की पंद्रह हार चौक हैं -- जिनमें चार हिंडोलों की पंद्रह हार =60 चौदह हिंडोलों की पांच हार =70 एक भोम के हुए 60 +70=130 चार भोम के हिंडोले हुए 130 * 4 =520

🌷बट पीपल की चौकी की चार भोम पांचवी चांदनी आयीं हैं ,चांदनी अति सुन्दर मानों नूरी रंग बिरंगें फूलों का गलीचा बिछा हो ,अति सुन्दर फूलों की बैठके तो चारों कोनों में क्या विशेष शोभा हैं जो चांदनी को स्पेशल बना रही हैं ❓                        

चांदनी के चारों कोनों पर चहबच्चे आएं हैं 

🌷बट पीपल की चौकी के धाम तरफ आएं 15 वृक्षों  ने 22  सीढ़ी बना कर रंगमहल की किस शोभा से मिलान किया हैं ❓                        
रंगमहल के छज्जों से मिलान किया हैं 

🌷बट पीपल की चौकी की दूसरी और तीसरी छत ने रंगमहल के क्रमशः दूसरी और तीसरी भोम के छज्जो से मिलान किया हैं तो वनों की चौथी छत या पांचवी चांदनी ने चौथी भोम के छज्जों से मिलान किया हैं तो रूह यहाँ से (बट पीपल की चौकी की चांदनी से ) किस भोम में जाती हैं ❓

निरत की भोम 

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

bat pipal ki chouki me raman

                        प्रणाम जी 
बट पीपल की चौकी में चल मेरी रूह 

रंगमहल की दक्षिण दिशा में हैं रूह --धाम रोंस पर 
रंगमहल की दक्षिण दिशा 
 अग्नि कोण और नेऋत्य कोण के मध्य आये रंगमहल के 50  हान्स 
एक एक हान्स तीस मंदिर का तो 1500  मंदिरों की अपार झिलमिलाती शोभा

                        धाम की नूरी मंदिर और मंदिरों के बाहिरी और धाम रोंस --

अति सुन्दर नूरभरी  रोंस --आने जाने ,रमन का सुन्दर रास्ता --

तो रोंस के भीतर मंदिर और बाहिरी किनार पर हान्स हान्स से चांदा से उतरती सीढ़ियां और शेष जगह सुन्दर कठेड़ा
चांदा का निशान 👆👆👆
रूह अब होना चाहती हैं बट पीपल की चौकी की और 

तो वह बढ़ती हैं सीढ़ी की और --

रूह ने देखा एक मंदिर का लम्बा चौड़ा चबूतरा धाम चबूतरा के साथ लगता हुआ आया हैं और उसके दोनों और सीढ़ियां उतरी हैं --चबूतरा के भीतर की और धाम चबूतरा से मिलान हुआ हैं और वन की तरफ कठेड़ा आया हैं --रूह इन सीढ़ियों से नीचे उतर रही हैं ,उतरते समय रूह के पाँव घुटनों तक घंस रहे हैं ,देखिए ना गिलम की कोमलता ,नरमाई ,सुंदरता --सीढ़ियों के एक और धाम चबूतरा की नूरी द्वार ,उनमें चित्रित नूरी ,चेतन चित्रामन और दूसरी और स्वर्ण जड़ित कठेड़ा (रेलिंग)

रूह सीढ़ियों से उतर कर खुद को एक मंदिर की रोंस पर देखती हैं जो धाम चबूतरा से लगती हुई आयी हैं और जिस पर सीढिया उत्तरी हैं और अब शोभा देखनी हैं बट पीपल की चौकी की                        


रूह ने देखा --इन्हीं रोंस से लगते हुए बट पीपल की चौकी की अद्भुत ,अति मनोहारी शोभा आयीं हैं --चौकी का पहला नहर का चबूतरा रोंस से एक रूप मिलान करता हुआ आया हैं


                         तो रूह ने शोभा देखी कि सीढिया उतर कर नीचे जिन रोंस/स्थान पर पहुँचती हैं रूह, उससे लगते हुए बट पीपल की  चौकी का पहला नहर का चबूतरा एक मंदिर का चौड़ा और 1500  मंदिर का लम्बा रंगमहल की दक्षिण दिशा में साथ साथ आया हैं                        
 इन पहले आड़े चबूतरे के बाद 100  मंदिर के दुरी पर दूसरा नहर का चबूतरा आया हैं --इस तरह से कुल छः आड़े नहर के चबूतरा आएं हैं  --रंगमहल से दक्षिण की और बट पीपल की चौकी 500  मंदिर की चौड़ी और रंगमहल की दीवार के  साथ साथ 1500  मंदिर की लम्बी आने से छः आड़े नहर के चबूतरा आये हैं और खड़े चबूतरे सोलह आये हैं जो एक मंदिर के चौड़े और 500  मंदिर के लम्बे हैं यह सीढ़ी वाली रोंस से दक्षिण की और 100 -100  मंदिर के अंतर से आएं हैं
इन नक़्शे में देखे आड़े खड़े नहर के चबूतरे जो नीला रंग में दर्शाए गए हैं 👆👆
इन आड़े खड़े नहर के चबूतरों के मध्य पांच के पंद्रह हार चौक बने 

ऊपर वाले नक़्शे में जो पीला रंग में दर्शाए हैं
सर्वप्रथम रूह शोभा देखती हैं नहर के चबूतरा की 


अत्यंत मनोहारी शोभा --चबूतरा के मध्य भाग में 50  हाथ की जगह में नहर आयीं हैं ,नहर का उज्ज्वल ,नूरी जल झिलमिलाता हुआ और नहर के दोनों और नंगन के सुन्दर नूरी रोंस आयीं हैं
अब शोभा देखनी हैं पांच के पंद्रह हार जो चौक आएं हैं उनकी --


एक चौक की शोभा रूह देख रही हैं --100  मंदिर का लम्बा चौड़ा चौक सुशोभित हैं जिसकी चारों दिशा में शित्म सुगन्धित जल की नेहेरें प्रवाहित हो रही हैं और चारों कोनों पर सुन्दर जल के कुंड चहबच्चे हैं जिनसे पांच पांच जल के फुहारें उठ रही हैं --जल की एक धारा ऊपर की और जाकर नीचे गिरती हैं और चार धाराएं चारों दिशा के जल कुंडों में मेहराब बना कर जाती हैं
                        और चौक के ठीक मध्य में 33  मंदिर का लम्बा चौड़ा चबूतरा शोभायमान हैं --

रूह अब बढ़ती हैं रोंस से आगे 
नहर के चबूतरा को पार करना हैं तो नहर की रोंस पर आयीं जो उस रोंस से एक रूप मिलान करती हुई आयीं हैं जिन रोंस पर सीढ़ियां उतरी हैं --नहर की अति सुन्दर ,मनोहारी रोंस --रोंस पर सजी मनोहारी बैठके --

आगे नहर --कितना शीतल ,सुगन्धित और उज्जवल जल ---सामने सुन्दर पुल हैं --रूह पुल से नहर को पार कर रही हैं ,पुल पार करते समय कदम मानो जल के ऊपर हो ,ऐसा महसूस हो रहा हैं --धाम का नूरी जल ,रूह को धनि के इश्क में भिगोता हुआ
रूह पुल पार करके पुनः रोंस पर आती हैं --रोंस से भीतर तीन सीढ़ियां उतरी हैं ,उन सीढ़ियों से उतर कर रूह खुद को चौक में देखती हैं --चौक के मध्य में चबूतरा पर वृक्ष शोभित हैं ,चबूतरा को घेर कर नूरी मोती बिछी हैं और चारों दिशा में नेहेरें और चारों कोण में चेहेबच्चों की अपार शोभा रूह देख रही हैं
नरम ,कोमल चेतन रेती में होते हुए रूह चबूतरा पर आती हैं और देखती हैं शोभा --चबूतरा की चारों दिशा से तीन तीन सीढ़ियां रेती में उतरी हैं --सीढ़ियों की जगह छोड़कर शेष जगह कठेड़ा आता हैं
चबूतरा के ठीक मध्य में वृक्ष का नूरी तना ,अत्यंत ही विशाल तना उठा --तने के चारों दिशा ने सुन्दर दरवाजे आये हैं --इन वृक्ष ने दूसरे चौक में वृक्षों से एक रूप मिलान करते हुए फूलों पत्तियों की सुन्दर चन्द्रवा किया हैं --


इसी तरह से सभी चौक की शोभा हैं ,एक बट ,एक पीपल ,फिर एक बट एक पीपल --इसी क्रम से वृक्ष आएं हैं --

इन वृक्षों की डालियों ने मेहराबें बना कर मिलान किया हैं उनमें सुन्दर फूलों से सुसज्जित हिंडोले आएं हैं
आप श्री राज श्यामा जी के संग रहे इन वन में विहार करती हैं ,कई प्रकार के रंगों से खिली खिली यह चौकी चार भोम पांचवीं चांदनी की आयीं हैं --

तले की भोम में जब हिंडोले झूलते हैं तो नीचे नेहरे चल रही होती हैं फुहारों का नूरी जल प्रतिबिंबित होता हुआ बड़ा ही सुन्दर प्रतीत होता हैं
नूरी जल का शीतल अहसास ,सुगन्धि चेतनता हर और बिखरी हुई और छोटे छोटे पशु पक्षियों का उमड़ उमड़ कर आना और करतब करके धाम धनि को रिझाना और सबसे  सुखद पल जब श्री राज जी के नयनों में नयन जोड़ रूह झूलों में झूलती हैं




नूरी जल का शीतल अहसास ,सुगन्धि चेतनता हर और बिखरी हुई और छोटे छोटे पशु पक्षियों का उमड़ उमड़ कर आना और करतब करके धाम धनि को रिझाना और सबसे  सुखद पल जब श्री राज जी के नयनों में नयन जोड़ रूह झूलों में झूलती हैं                        

 ऊपर की भोमों में फूलों की छाँव तले धाम धनी संग झूलना -चौकी की चार भोम पांचवीं चांदनी आयीं हैं ,प्रत्येक भोम में हिंडोलों के अपार सुख रूह लेती हैं --और चांदनी के सुख की तो क्या कहे ?
                        बट पीपल की चांदनी की बेहद ही प्यारी शोभा हैं मानो फूलों की गिलम बिछी हो और चारों कोनों में सुन्दर जल के कुंड 

इन चेहेबच्चों से फुहारें उछाल रहे हैं --चांदनी की पूर्व दिशा में नारंगी वन शोभित हैं ,उत्तर दिशा में रंगमहल की अपार शोभा हैं चांदनी से निरत की भोम में जाइये 

दक्षिण और पश्चिम दिशा में बड़ों वन की शोभा हैं 

इन सुख को निसबती रूहें ही जानती हैं

शनिवार, 1 जुलाई 2017

bat pipal ki chouki

प्रणाम जी 
चले सखियों बट पीपल की चौकी 

अपनी आत्मिक दृष्टि को श्री राज जी की मेहर से परमधाम में लेकर चलते हैं जहाँ  मध्य में भोम भर ऊंचे चबूतरे पर रंगमहल सुशोभित हैं --रंगमहल की पूर्व दिशा में सात वनों की अपार शोभा को दिल में धारण कर अब रूह बढ़ती हैं दक्षिण दिशा की और 

जहाँ अग्नि कोण (दक्षिण पूर्वी कोण ) और नैऋत्य कोण (दक्षिण -पश्चिम ) के मध्य रंगमहल के 1500  मंदिर आयें हैं ।इन 1500  मंदिरों के आगे आयी नूरी रोंस हमारी धाम रोंस पर खुद को देखे ,महसूस करे कि मैं रंगमहल की दक्षिण दिशा में आयीं धाम रोंस पर खड़ी हूँ ।
दक्षिण दिशा की और आयीं धाम रोंस पर हैं हम - धाम की नंगों की सुन्दर रोंस ,नरमायी लिए ,सुगन्धि से महकती चेतन रोंस  -धाम रोंस के भीतरी तरफ रंगमहल के मंदिरों की अलौकिक शोभा हैं ,बेशुमार रंगों-नंगों से सुसज्जित अति सुन्दर नूरी मंदिर --


धाम के बाहिरी किनार प्रत्येक हान्स में चांदे से नूरमयी सीढ़ियां उतरी हैं और शेष जगह कठेड़ा आया हैं --1500  मंदिर हैं दक्षिण दिशा में ,30  मंदिर का एक पहल/हान्स होने से 50  हान्स हुए तो रूह देख रही हैं --50  हाँसों से उतरती मनोहारी सीढ़ियां और शेष जगह रत्नो जड़ित  कठेड़ा (रेलिंग) आयी हैं --


रूह सीढ़ियों की और बढ़ती हैं तो देखती हैं की धाम के भोम भर ऊंचे चबूतरा के साथ एक चबूतरा उठा हैं जिसके दोनों और से भोम भर सीढ़ियां उतरी हैं
रूह चांदा से सीढ़ियां उतरती हैं --एक और तो (रंगमहल की और ) चबूतरा की सुंदर दीवार आयीं हैं और वनों की तरफ सुन्दर कठेड़े की शोभा हैं ।रूह सीढ़ियों की अनुपम शोभा देखते हुए सीढ़ियां उत्तर रही हैं --सीढ़ियों पर बेहद ही नरम फूलों सी महकती गिलम बिछी हैं ,चेतन गिलम जो रूह के कदम धरती ही और भी कोमल हो अभिनन्दन कर रही हैं --धाम की और दीवार में आये सुन्दर चित्रामन और कठेड़े के चित्रामन भी अति सुन्दर प्रतीत हो रहे हैं --भोम भर की सीढ़ियां उत्तर कर रूह नीचे आयीं एक मंदिर की रोंस पर हैं --रूह  का मुख हैं दक्षिण की और --

नीचे आयीं एक मंदिर की रोंस के साथ ही बट पीपल की चौकी की अलौकिक शोभा आयीं हैं --रंगमहल के साथ लगती हुई 1500  मंदिर की लम्बी और दक्षिण  की और 500  मंदिर की चौड़ी बट पीपल की चौकी चार भोम पांचवी चांदनी की सुशोभित हैं

रूह इन एक मंदिर की रोंस पर खुद को महसूस करती हैं ,इन रोंस के साथ लगता ही बट पीपल की चौकी का पहला नहर का चबूतरा आया हैं --
रोंस के साथ लगता पहला नहर का चबूतरा एक मंदिर का चौड़ा और 1500  मंदिर का लंबा रंगमहल की दक्षिण दीवार के साथ साथ आया हैं --(आडी)


इस तरह के छः चबूतरा आये हैं 100 -100 - मंदिर की दुरी पर 

और रंगमहल  की रोंस से दक्षिण की और 500  मंदिर के लम्बे सोलह खड़े चबूतरा आएं हैं -यह भी 100 -100 - मंदिर की दुरी पर आएं हैं 

इन नहरों के आने से पांच की पंद्रह हार चौक बने
एक नहर के चबूतरा की शोभा रूह देख रही हैं


एक मंदिर के नहर के चबूतरा के मध्य में 50  हाथ में उज्ज्वल जल की नहर शोभित हैं --नहर के निर्मल जल ,उनकी लेहेरे और नहर के दोनों और 25  -25  हाथ की नूरी रोंस आयी हैं -
                        जहाँ नेहरे आपस में काट रही हैं वहा मनोहारी चहबच्चे की शोभा हुई जिनसे पांच पांच फुहारे उठ रहे हैं
अब रूह एक चौक की शोभा देख रही हैं ऐसे पांच की पंद्रह हार चौक आएं हैं --

प्रत्येक चौक सौ मंदिर का लम्बा चौड़ा आया हैं --चौक की चारों दिशा में मनोहारी नहरों की अपार शोभा हैं और चारों कोनों पर चहबच्चे आएं हैं जिनसे नूरी सुगन्धित जल के पांच पांच फुहारे उछल रहे हैं
                        चौक के मध्य में ३३ मंदिर का लम्बा चौड़ा तीन सीधी ऊंचा चबूतरा आया हैं जिसकी चारों दिशा से आठ -आठ मंदिर की विशाल जगह से तीन तीन सीढ़ियां उतरी हैं --सीढ़ियों को छोड़कर शेष जगह घेर कर स्वर्णिम कठेड़ा हैं--

चबूतरा के मध्य में एक मंदिर का नूरी तना उठा ---अति सुन्दर नूरमयी तना जिसकी चारों दिशा में द्वार आएं हैं --तना ७५ हाथ सीधा ऊपर को उठा हैं फिर २५ हाथ में डालियाँ बढ़ी हैं जिन्होंने दूसरे चौकों में आएं वृक्ष की डालियों से एक रूप मिलान करके सुन्दर चन्द्रवा किया हैं --फूलों पत्तियों ने एक रूप मिलन करके सुंदर छत डाली हैं
इस तरह की अति मनोहारी शोभा लिए पांच की पंद्रह हार चौक आएं हैं जिनमे बट और पीपल के वृक्ष क्रमशः आएं हैं --इस तरह से 4 वट वृक्ष के बीच मे एक पीपल वृक्ष, तो 4 पीपल के वृक्ष के बीच मे एक वट वृक्ष ऐसी शोभा मेरी रुह देख रही हैं। 


इन 75  चौकों में 14  की चार हार चौक चहबच्चे के आयें हैं कुल 56  चौक --16 चहबच्चे श्री घाम की तरफ़ (उत्तर दिशा )और 16 चहबच्चे कुंज निकुंज वन (दक्षिण दिशा ) की तरफ़ हैं। 4 चहबच्चे बटपीपल की चौकी के पूर्व दिशा में  स्थित नारंगी घाट की ओर तथा 4 चहबच्चे  बटपीपल की चौकी के पश्चिम दिशा में हैं  तथा 4 चहबच्चे वटपीपल की चौकी की चाँदनी पर हैं। इस तरह कुल  100 चहबच्चे हुए।

इन 75  चौकों के वृक्षों की डालियाँ आपस में मिलकर मिलान करती हैं --इन मेहराबों में सुंदर हिंडोले आयें हैं --आप श्री राज जी श्री श्यामा जी और सखियाँ इन हिंडोलों में जब हींचते हैं तो नीचे नेहेरें चहबच्चे चलते हैं --शीतल जल का सुखद अहसास ,सुगन्धि ही सुगन्धि और बारिश की नूरी बुँदियाँ का उमड़ उमड़ कर आना और सपर्स्क करना 

मोरों का नृत्य कर धनि को रिझाना --नजर से नजर बाँध हिंडोलों में झूलती रहें ही इन सुखों की अनुभूति कर रही हैं
चौकी की चार भोम पांचवीं चांदनी आयीं हैं --प्रत्येक भोम में हिंडोलों के सुख और एक अजब शोभा प्रियतम श्री राज जी ने रूह को दिखलाई --


देखे 

रंगमहल की दीवार के साथ आयीं वृक्षों की पहली  हार पंद्रह वृक्षों ने पहली नहर के चबूतरा के सर पर 22  सीढ़ियां बना कर छत ऊंची की और रंगमहल की दीवार के साथ जाकर झरोखों से एक रूप मिलान किया हैं --वृक्षो की दूसरी छत  ने रंगमहल की दूसरी  भोम के छज्जों से मिलान किया हैं 

वृक्षो की तीसरी  छत ने रंगमहल की तीसरी  भोम के छज्जों से मिलान किया हैं

वृक्षो की चौथी   छत ने रंगमहल की चौथी भोम के छज्जों से मिलान किया हैं

तो बट पीपल की चांदनी से रंगमहल की निरत की भोम में जा सकते हैं --चांदनी पर चार चेहेबच्चों की मनोरम शोभा रहें देख रही हैं ---

रूह की नज़रों से ही यह शोभा दिल में उतरती हैं

सोमवार, 12 जून 2017

SAT VAN SHOBHA QUE-ANS

1--रूह खड़ी हैं श्री रंगमहल के मुख्य दरवाजे के आगे दो मंदिर के लम्बे चौड़े चौक में -चौक की उज्ज्वल आभा और दोनों और चबूतरों की अपार शोभा और ठीक सामने धाम की अति विशाल ,मनोहारी सीढ़ियां उत्तर रही हैं --रूह इन सीढ़ियों पर पग धरती हैं ,अति कोमल सीढ़ियां रूह को कहाँ पहुंचाएंगी ?

यह सीढ़ियां  रूह को 166 मंदिर लंबे चौड़े अमृत वन के तीसरे हिस्से में आएं चांदनी चौक में मध्य रोंस पर पहुंचाएगी  
2--चांदनी चौक में खड़ी हैं और हाजिर खिलौने असवारी के लिए प्रस्तुत 
नूरी घोड़े पर रूह असवार हुई और धाम का नूरी घोड़ा आकाश में उड़ान भर रूह को धाम नजारें दिखाने लगा 
रूह हैं धाम में और वहां से देखती हैं वन 
सात वनों की अलौकिक शोभा 

तो यहाँ रूह को धनि ने किस क्रम में वन दिखाए  ?

हम धाम में हैं तो धाम के धनि यह सबसे रंगमहल के पूर्व में आये सात वनों में से मध्य के अमृत वन की शोभा दिखाएंगे फिर दक्षिण  की और आये केल वन, लिबोई वन अनार वन,अमृत ,जाम्बु ,नारंगी ,वट  ( दक्षिण से उत्तर  की और)


यह क्रम धाम में खड़े होकर से देखने पर हैं अगर हम कालमाया के ब्रह्माण्ड को पार कर बेहद को पार कर पहुँचते हैं तो देखेंगे यही क्रम --उत्तर से दक्षिण की और 

3--जमुना जी का निर्मल ,दूध से उज्जवल ,मिश्री से मीठा जल और जमुना पर आये दो पुल 

तो किन दो पुलों के बीच सात घाटों के रूह ने दर्शन किए   ?
केल पुल और वट पुल इन दो पुलों के बीच में सातों घाटों के दर्शन किये ।

4--रूह नूरी घोड़े पर असवार सात वनों के ऊपर आसमान की ऊंचाइयों में हैं ..धनि की मेहर से रूह ने दर्शन किए --वनों की अति सुन्दर चांदनी के --फूलों -फलों और पत्तियों ने कृपा कर एक रूप छत्रीमण्डल डाला हैं --मखमली चांदनी --रूह इन चांदनी पर उत्तरी हैं --साथ में सखियाँ भी आ गयी --चांदनी पर रमन के सुख रूह ले रही हैं ..अति कोमल ,सुगन्धि से महकती वनों की चांदनी --रूह ने धाम धनि ने दिखाया कि वन दो भोम तीसरी चांदनी के सुशोभित हैं और जमुना कि पार पर बड़ो वन के वृक्षों की पांच हारें हैं जो घाट रूप में सुशोभित हैं इनकी कितनी भोम हैं ?

 पांच भोंम और छट्ठी चांदनी

5--केल वन और वट वन में से बड़ो वन के वृक्षों की हार आने से यह वन कितने भोम के प्रतीत हो रहे हैं ?

बड़ो वन के वृक्ष आने से केल वन और बट वन पांच भोम छट्ठी चांदनी के रूप में प्रतीत हो रहे हैं

6--रूह ने देखा कि तीन वन रंगमहल की दिवार से लगे हैं यह कोनसे तीन वन हैं ?

अनार,अमृत  और जाम्बू यह तीन वन रंगमहल की दिवार से लगे है ।

7--रंगमहल के मुख्यद्वार के सामने रूह ने देखा कि अमृत वन शोभयमान हैं --द्वार के ठीक सामने अमृत वन के तीसरे हिस्से में चांदनी चौक आया हैं --द्वार से सीढ़ियां उत्तर कर चांदनी चौक कि मध्य रोंस हैं यह रोंस अमृत वन को दो हिस्सों में बाटती हुई अमृत वन से जमुना जी और बढ़ रही हैं --आगे पुखराजी रोंस ,वन रोंस पाल पर होते हुए यह कोनसे घाट पहुंचाती हैं ?

धामधनि के साथ चलती हुई रूह चांदनी चौक के मध्य नंगो की रोस पार कर अमृत वन की रोस जिस पर अमृत वन के वृक्षो की मेहेराबे बनी हुई है यह रोस पार करके पुखराजी रोस एवं वन रोस एवं पाल पार करके पाटघाट पर पहुचती है

8--रूह वन की चांदनी से तले की भोम में पहुँचती हैं और देखती हैं आडी खड़ी नहरों के मध्य 500  मंदिर के लम्बे चौड़े बगीचे आयें हैं --इन बगीचों में डोरी बांध वृक्षों की हारें आयीं हैं यह वृक्ष कितने मंदिर की दुरी पर आयें हैं ?

500 मंदिर के लम्बे चौड़े बगीचों में यह वृक्ष दो दो मंदिर की दूरी पर आए है ।

9--रंगमहल से लगते तीन वन आयें हैं जिनके रंगमहल से लगती वृक्षों की हारों ने आगे बढ़कर मंदिरों से मिलान किया हैं --पहली भोम रंगमहल के झरोखों से मिलान करती हैं तो वनों की दूसरी भोम की डालियाँ बढ़कर  किससे मिलान करती हैं ?

दूसरी भोम के छज्जों से 

शुक्रवार, 9 जून 2017

jamuna ji ke kinare sat ghaato men raman

प्रणाम जी 

रूह मेरी चले धाम की सैर करने ,संग में धाम धनि हो ,प्यारी निसबती सखियाँ हो --रंगमहल की नवमी भोम में रूह खुद को महसूस कर --पूर्व दिशा की मनोहारी बैठक और धाम धनि तुझे अंगूरी के इशारे से सात वनों की मनोहारी ,अलौकिक शोभा दिखला रहे हैं --


धाम में हैं रूह  --

देख तो बायीं और से --केल ,लिबोई ,अनार ,अमृत ,जाम्बु ,नारंगी और वट वन की अलौकिक ,सुहानी शोभा ---कितनी सुन्दर चांदनी ,फूलों की मखमली चादर सी बिछी ,सुगन्धि से लबरेज --केल और वट वन पांच भोम छठी चांदनी के दिखाई दे रहे हैं  --यह वन दो भोम तीसरी चांदनी के ही हैं पर इन वनों से बड़ो वन के पांच वृक्षों की हारें निकली हैं जिनकी पांच भोम  छठी चांदनी हैं --यह वृक्ष केल वन में गुजरे तो केल वन का रूप ले कर शोभित हुए वट में निकले तो वट वृक्ष के रूप से सुसज्जित हो गए जिनसे इनकी पांच भोम छठी चांदनी दिखाई देती हैं --इन वृक्षों में अति सुंदर फूलों के सुखदायी हिंडोले हैं ।रूह के दिल में आयीं इन हिंडोलों में धाम धनि श्री राज जी के संग झूमों ,श्री श्यामा जी के संग हिंडोलों में सेज्या हिंडोलों में झूलूं --तो देख तो रूह --दिल में इच्छा उपजते ही युगल स्वरूप श्री राज जी श्री श्यामा जी के संग ,सखियों के साथ वट वन में आएं वट रूप में सज्जित वृक्षों के अति सुखदायी हिंडोलों में खुद को देखा --
रूह को श्री राज जी ने दिखाएं अति सुन्दर हिंडोलों की शोभा --कहीं बैठ के झूलने की लीला तो कहीं सेज्या हिंडोले तो कहीं रूह खड़े खड़े हिंडोलों में हींचने का सुख ले रही हैं ।अति सुन्दर ,सुखदायी धाम के अखंड सुखों से रूह को प्रसन्न करते झूले --रूह इन हिंडोलों में झूलने के सुख ले रही हैं --कोई सखी श्री राज जी का मुख निहार रही हैं तो कोई उनके अंग -संग झूला झूल रही हैं --एक का सुख सभी के दिल को आनंदित  कर रहा हैं --सभी के मुख उल्लास से भरे ,प्रेममयी क्रीड़ा में मग्न --


इन समय में पक्षियों के झुण्ड के झुण्ड आ आ कर अर्शे मिलावा का दीदार कर रहे हैं ,उनकी पीऊ-पीऊ,तुहि -तुहि की मीठी गुंजार और नजर से नजर बाँध झूलते प्रियतम श्री राज जी की लाड़ली सखियाँ ,उनके भुखनों की मधुर स्वरों की गूंज और ठंडी ठंडी बयार के झोंके सहलाते हुए --

सामने पांच वनों की अति सुन्दर चांदनी और केल के वन की शोभा --

झूलों के सुख ले तले की भोम में आएं तो धनि ने दिखाई शोभा 


यह सात वन अति मनोहारी शोभा से युक्त हैं ,सभी वन 500  मंदिर के चौड़े और जमुना जी तक 2000  मंदिर के लम्बे आएं हैं । आडी -खड़ी नहरों के मध्य 500  -500  मंदिर के चार चार बगीचे शोभित हैं --इन एक बगीचा में दो-दो मंदिर के अंतर पर नूरी वृक्ष आएं हैं --जिनकी डालियों ,फूलों पत्तियों ने एकल छत्रीमण्डल डाला हैं --इन की दो भोम तीसरी चांदनी की शोभा रूह देख रही हैं ----


सर्वप्रथम रूह युगल स्वरूप सखियों के संग केल वन पधारती हैं ।


इन सात वन जमुना जी तक सुशोभित हैं पाल पर बड़ो वन के वृक्षों की पांच हारें आयीं हैं ।बड़ो वन के वृक्ष जिस भी वन के सामने से निकलते हैं उसी रूप में हो जाते हैं ।अब धाम धनि श्री रूह को केल पुल के नजदीक आएं केल घाट की शोभा दिखला रहे हैं ।जिनके अंदर बहुत ही सुन्दर चौक आए हैं ।केले के गुच्छे जमुना जल पर लटकते हुए बेहद ही सुन्दर प्रतीत हो रहे हैं ।जमुना जी के जल के ऊपर कच्चे और पक्के केलो के कतरे लटके हुए बहुत सुन्दर दिख रहे हैं -- बीच बीच में दरवाजे बने हैं -- केलो की डालियों की मेहेराबो ने कई तरह की शोभा से पाल को  ढका हैं --चौक के चारो तरफ केले के कतरे लटक रहे हैं - नीचे ज़मीन पर मोती के समान रेती के चौक बने हैं जिनकी नूरमयी रोशनी अपार झलकार  कर रही है।चौको के बीच गलियां आई  हैं जिनके ऊपर पत्तो ने सुखकारी  छाया की हैं ।बाहिरी हार में केले के फलों की शोभा हैं भीतरी और सभी प्रकार के नारियल ,सुपारी और आँवला आदि के वृक्ष शोभित हैं ।

केल घाट-केल वन में रूह कोमलता ,परमधाम की मनोहारी ,स्नेहिल शोभा को महसूस कर आगे लिबोई घाट पहुँचती हैं 



लिबोई घाट के वृक्ष हर कतार मे पाँच भोंम छठी चाँदनी के अपार नूरमयी झलकार कर रहे हैं ।इस घाट में निम्बू के अलग अलग वृक्षों की लंबी लंबी डालियां एक दूसरे से मिलकर सबकी एक  छत हो गयी हैं।इनकी शीतल छाया सुगन्धि से भरपूर हैं ।जल के किनार वृक्षों की जो हार आयीं हैं उनके कच्चे पक्के निम्बू के फल जवेरहातों  की तरह लटक रहे हैं ।लिबोई वन में निम्बू के नूरी फल छतरियों की छाया में लटक रहे हैं जो सुगन्धित हवा के झोंके से जब हिलते हैं तो रूह का अंग प्रत्यंग झूम उठा ।एक भोम नीचे ज़मीन पर है जिसमें मोती के सामान उज्जवल  रेती बिछी हैं ,दूसरी भोंम मध्य में आई है , और तीसरी चाँदनी कही है। चांदनी की शोभा अति सुन्दर हैं ।नींबू घाट की हद पश्चिम में ताड़ वन तक आई है।
लिबोई वन में श्री युगल स्वरूप सखियों के संग प्रेममयी क्रीड़ा करते हैं उन समय वन की शोभा का वर्णन नहीं कर सकते हैं ।अब श्री राज जी के हुकम से परमधाम के अलौकिक अनार घाट की और जा रही हैं


अब पाल चबूतरे पर अनार के घाट के वृक्षों की शोभा धाम धनी रूहों को दिखला रहे हैं -- पाल चबूतरे की शोभा एक ही हीरे की आई है।पाल के दोनों किनारों पर दो हार वृक्षों की आई है और वृक्षों की तीन हार चबूतरे के मध्य आई है।जमुना जी की तरफ वृक्षो की जो हार है उसके आगे रत्नों  से जडित सीढ़ियां शोभा ले रही हैं --जल चबूतरे से सीढ़ियाँ उतरते हुए जल की ज़मीन तक आई है।अनार वन की दो भोम छठी चांदनी आयीं हैं और जमुना जी के पाल पर  अनार रूप में आएं बड़ो वन के  दोरी बँध वृक्षों की पाँच भोंम छठी चाँदनी आई है जिनके बीच चौक आए हैं।जिनकी शोभा बहुत ही सुहावनी है ।अनार के फल और फूलों की लालिमा चारो और झलकार कर रही है !यहाँ पर श्री युगल स्वरूप सखियों के साथ नित्य विहार करते हैं।यह घाट रंगमहल के पाँच सौ मंदिर के सामने आया है- इस घाट के सामने रंगमहल के  पाँच सौ झरोखे और एक हज़ार दरवाजे सुन्‍दर शोभा ले रहे हैं ।अनार वन में यहाँ वृक्षो की हार मे दो दो मंदिर की दूरी पर एक एक वृक्ष आया है !अतः घाट की चौड़ाई में दो सौ पचास वृक्ष हुए यह शोभा अत्यंत सुखकारी है।इन वृक्षो की दो भोंम है ! एक भोंम ज़मीन पर और एक मध्य मे है ! तीसरी चाँदनी की पहचान रूह कर रही हैं ।जब रूह रंगमहल की पहली भोंम के दरवाजे मे खड़े होकर देखती  हैं तो नीचे की ज़मीन दिखाई देती है और जब झरोखों में बैठते हैं तो वृक्षो की दूसरी भोंम दिखाई देती हैं -जब रंगमहल की दूसरी भोम मे बैठते हैं तो बनो की तीसरी चाँदनी नज़र आती है


अब धाम धनि श्री राज जी पाट घाट के सामने अमृत वन की अति मनोहारी ,सुन्दर शोभा में रूह को ले जा रहे हैं
दोनों पुलों के बिच में जमुना जी के दोनों किनारों पर सात सात घाट आएं हैं जिनके मध्य में अमृत वन के सामने पाट घाट आया हैं ।पाट घाट के सामने आया अमृत वन अत्यधिक सुन्दर हैं ।रंगमहल के मुख्य द्वार के अति निकट यह वन मनोरम शोभा से युक्त हैं ।अमृत वन में अखरोट ,अंजीर के नूरी वृक्ष आयें हैं जिनके ऊपर अंगूर की बेलों की शीतल छाया रूह महसूस कर रही है जो धाम दीवार तक चली गयी हैं ।

पाट घाट से दो मंदिर की नूरी रोंस जो अमृत वन के बीच में होती हुई धाम की सीढ़ियों तक ले जा रही हैं और धाम दरवाजे के सम्मुख विशाल चांदनी चौक रूह देख रही हैं 

अब जमुना  जी किनारे जाम्बू घाट में रूह रमन कर रही हैं --जाम्बू घाट और बटघाट के बीच में नारंगी घाट की शोभा है -जमुना जी के दोनो किनारे  रतन जडित शोभेयमान है और दोनो बाजू दो पाल चबूतरो का बराबर विस्तार है -कमर भर  जल के नीचे एक जल चबूतरा शोभा ले रहा है--रूह श्री राज जी श्री श्यामा जी के संग जल रोंस से सीढ़ियाँ उतर कर जल चबूतरे पर आयीं --यह सभी शोभा नूरमयी जवेरहातों की हैं जिनकी झलकार आकाश तक जा रही हैं --जमुना जी का जल दूध से भी उज्ज्वल है और अपार सुगंधी से महक रहा है !जमुना जी किनारे सुशोभित वन ,वृक्ष और पत्ते भी सुगंधी फैला रहे हैं।


प्रियतम श्री राज जी की मेहर से रूह पांचवां घाट जाम्बु घाट में रमण कर रही हैं ।उन समय के सुख वर्णन से परे हैं ।इन घाटों के बीच रूहें  श्रीराज  जी के साथ खेलती हैं - जमुना जी में झीलने के समय  दिल में मान लेकर धनी से बाते करती हैं -रूह श्री राज जी श्री श्यामा जी के संग जमुना जी के नूरी उज्जवल  जल में प्रवेश करती हैं-तो कोई रूह वनों की डालियों को पकड़ जमुना जी के जल में छलांग  लगाती हैं 
कुछ प्यारी सखियाँ जमुना जी की पाल पर शर्त लगाकर दौड़ लगा रही हैं।कोई सखी प्रियतम श्री राज जी के संग पाल पर आयीं बैठकों में बैठ उनसे मीठी मीठी रसना के सुख का रसास्वादन कर रही हैं तो एक रूह श्री राज जी श्री श्यामा जी के मुख को निरख रही हैं ।कोई सखी वृक्षों के ऊपर से खड़े खड़े कूदने के लिए शोर करती है !कुछ एक दूसरे को बुलाते हुए जगह जगह रमण करती है।कोई सखी विचार करते हुए दूसरी सखी का हाथ पकड़ के वृक्षों के ऊपर जाती हैं और दोनो हाथ जोड़कर  कूदती हैं।एक सखी दूसरी सखी के सामने जल छाँटने लगती है और सामने से दूसरी सखी भी जल छाँटने लगती है!श्री राज जी दोनो सखियों के मुख की आभा देख प्रसन्न हो रहे हैं ।श्रीराज जी और श्री श्यामा जी जब सखियों के साथ जल में तैरते हैं तब सखियाँ रमण करते समय जल छिटक कर श्रीराज जी के साथ सुख लेती हैं।इस अलौकिक रमण के समय कोई सखी तृप्त नही होती - जल से किसी भी तरह निकलती ही नही है क्योकि रमण में उसे अपार सुख की अनुभूति हो रही होती है ।जब श्रीराज जी श्यामा जी वापिस आते हैं तो साथ में रूहें भी दौड़कर आती हैं।चार-चार सखियाँ तत्क्षण पहले अपना सिनगार सजती है और जैसे श्रीराज जी और श्यामा जी चबूतरे पर आते हैं उन्हे घेर लेती हैं।सिनगार के समय एक एक सखी श्रीराज जी श्यामा जी को सिनंगार कराती हैं - सभी सखियों में हक के माफक इश्क और उमंग है।श्री राज जी श्री श्यामा जी के स्वरूप मस्ती भरे हैं ! उनके नख से सिख तक के सभी अंग-अंग अपार नूरमयी शोभा से युक्त हैं।उनके वस्त्राभूषण की नूरी ज्योति झलकार कर रही है और उनकी रंग बिरंगी किरणे आसमान में जंग कर रही हैं यह सुख धाम धनी या उनकी रूहें ही जानते हैं।
यह जाम्बु घाट में रमण कर रूह अब नारंगी घाट की और बढ़ती हैं 

नारंगी घाट में रूहें रमण कर रही हैं - यह उस अद्वैत भूमि का वर्णन हैं जहाँ एक पत्ता भी कभी गिरता ना ही एक पक्षी का पंख ही गिरता है- जहाँ के कण के तेज के आगे करोड़ो सूरज छिप जाते हैं- ऐसे नूरमयी, चेतन ,प्रकाशमान और सुगंधी से भरपूर अलौकिक घाट में रूहें प्रियतम श्रीराज जी के संग रमण कर रही  है और श्रीराज-श्यामा जी के साथ अलौकिक झीलने की क्रीड़ा के सुख ले रही हैं ।यह नारंगी घाट दक्षिण में वट घाट से जा कर मिला है और उत्तर मे जांबू  घाट से मिलकर अपार शोभा बढ़ा रहा है।जमुना जी की जल रोंस पर फलों के चार हारों के नीचे सात-सात फलों की कांगरी की शोभा आई है जिनकी लालिमा युक्त पीलापन लिए शोभा सुखकारी दिखाई देती है।इन वनों के बीच श्रीराज जी श्री श्यामा जी और सखियाँ रमण करते हैं।नारंगी वन के फल लटकते हुए मनोहारी प्रतीत हो रहे हैं ।कोई ब्रह्म प्रिया श्री राज जी  के सन्मुख आकर उनसे बाते करती है और महबूब श्रीराज जी उन्हे जवाब देते हैं ।कोई सखी श्रीराज जी के क्रीड़ा करती है तो कोई सखी रूहों के साथ खेलती है।वनों में रमण करती अपनी ब्रह्म प्रियाओं को जब श्रीराज जी देखते हैं तो उनके अंग प्रत्यंग में उमंग नहीं समाती है ।


जब श्रीराज जी और श्री श्यामा जी इन सीढ़ियों से उतरते हैं तो सभी ब्रह्म प्रियाएँ भी जल बिहार करने के लिए जमुना जी के निर्मल जल मे उतरती हैं ।कोई सखी तो ऊपर वनों से दौड़कर जल मे कूदती हैं और एक दूसरे को जल में रमण करने  के लिए बड़ी ही युक्ति से बुलाती हैं।कोई सखी हाथ जोड़ कर दूसरी सखी के साथ जल में कूदती हैं !श्रीराज श्यामा जी और सखियाँ खड़े खड़े  इनकी सराहना करते हैं।कोई सखी जल में तैरते हुए बहुत दूर तक निकल जाती है कोई सखी इनके पीछे चलती है तो कोई सखी खड़े रहकर बाते करती हैं।कोई सखी प्रेम से जल छांटती है फिर आमने सामने जुदे हो जाती हैं उन सखियों की इस लीला पर बहुत हाँसी होती है और श्रीराज जी श्यामा जी भी इस हंसी में शामिल होते हैं।सखियाँ जल छोड़ते हुए आसमान में उछाल रही हैं ! कई सखियाँ श्रीराज जी की तरफ होती हैं तो कई सखियाँ श्री श्यामा जी की तरफ होती हैं।श्रीराज जी के साथ कई प्रकार की जल क्रीड़ा करके बेशुमार सुख बिलास लिए।कोई सखी श्रीराज जी के सन्मुख खड़ी होकर सिनगार कराती है तो कोई श्री श्यामा जी को  सिनगार कराती है।झीलन के सुख रमण के सुख --अब धनि ले चल रहे बट घाट की और


बट वन की कुछ ख़ास शोभा हैं --बट वन की जगह कुञ्ज निकुंज की शोभा रूह ने देखी और बट घाट आया हैं -पाल और वन रोंस पर बट घाट सुशोभित हैं 


 इस चौक मे मध्य मे एक बट का पैड आया है। जिसकी चारो तरफ अस्सी बॅडवाईया आई है और एक मध्य मे बट का पैड । सब मिलकर 81 हुए जिनकी नौ की नौ हारे आई है। एक दिशा मे आठ मेहराबे हुई।इनकी पाँच भोंम छटी चाँदनी आई है ।हर भोंम मे आठ की आठ हारे चौक हुए जिनमे हिंडोले आए है। जमुना जी तरफ चौक से तीन सीढी उतर रूह सखियों के संग जल रोंस पर उतरती हैं  कभी  रंगमहल की तरफ चबूतरे से वन रोंस पर सीढी उतर वनो मे जाती हैं ! जमुना की तरफ वाली डालियों ने जल चबूतरे तक छतरिमंडल किया है और रंगमहल की और पुखराजी रोंस से मिलान किया है।बट वृक्ष के पत्तों ,फूलों और डालियों सभी नूरमयी विस्तार लिए हैं - इनमें आए नूरी हिंडोलों पर श्रीराज श्री श्यामा जी विहार करते हैं।
जब युगल स्वरूप श्रीराज श्री श्यामा जी की अस्वारी बट घाट पर उतरी  तब खिलौने एक कतार में खड़े हो गए ।सभी सुखपाल श्रीराज श्यामा जी के सुखपाल को घेरकर एक ही स्थान उतरते हैं।श्रीराज श्यामा जी सुखपाल से उतर कर लटकनी मटकनी चाल से चलते हैं-रूहें इस शोभा को देखकर अपार खुशहाल हो रही हैं ।किशोर स्वरूप अति सुन्दर श्रीराज जी के आभूषण  झलकार कर रहे हैं और उनके वस्त्र अंगों से लगे हुए हैं जिनसे तरंगों की कई ल़हेरें उठ रही हैं।
कोई सखी वन की डालियों पर चढ़ कर रमण कर रही  है तो कोई सखी  बट वृक्ष के नीचे क्रीड़ा करती है -कोई वट की डाली पर चढ़ जाती है तो कोई जमुना जी के तट पर खेलती है।कोई सखी हिंडोलों में हींचती है तो कोई सखी वट की डारी पर चढ़ ऊँचे जाकर दूसरी सखियों को टेर (आवाज़ ) कर बुलाती है।सखियाँ बट घाट की भोम -भोम मे हिंडोलें हींचती है और श्रीराज श्यामा जी उनके संग होते हैं-हक श्री  राज जी के सामने यहाँ कई विलास किए ! कोई सखी तो प्राण प्रियतम के सुखों को नयनों से निहारती हैं

श्री राज जी के बेशक इलम से जाना यह सुख हमारे अखंड निज घर परमधाम के हैं जिन्हे चितवन से रूह महसूस कर रही हैं ।