रविवार, 18 दिसंबर 2016

धाम दरवाजे तक पहुंचना हैं तो कैसे पहुंचे ❓



1⃣श्री रंगमहल का दरवाजा ज़मीन से कितना ऊंचा हैं ❓

परमधाम की जमीन से एक भोम ऊंचे चबूतरे पर रंगमहल सुशोभित हैं जिसका धाम दरवाजा पूर्व दिशा में सुखदायी झलकार कर रहा हैं

 2⃣सौ सीढ़ी बीस चांदे चांदनी चौक की किस दिशा में आएं हैं ❓

तो सखी ,चांदनी चौक में चलते हैं --ठीक मध्य में नगन जड़ित रोंस से होते हुए चांदनी चौक की पश्चिम दिशा की और चलते हैं --देखिए यह रोंस सीढ़ियों तक गयीं हैं --आगें धाम की सीढियां 

 3⃣चांदनी चौक की जमीन से लेकर रंगमहल के चबूतरे का तक सीढ़ियों का विस्तार ,उतार चढ़ाव कितना हैं ❓

चांदनी चौक की जमीन से सीढियां धाम के भोम भर ऊंचे चबूतरा तक गयी हैं -यह उतार चढ़ाव दो मंदिर का आया हैं 


 4⃣सीढ़ियों की लंबाई ,चौड़ाई और ऊंचाई कितनी हैं ❓

उत्तर से दक्षिन दिशा में यह सीढियाँ दो मंदिर की लंबी आयीं हैं --चांदनी चौक से पहली सीढ़ी एक हाथ ऊंची और एक ही हाथ चौड़ी आयीं हैं --तो ऐसे पांच सीढ़ी देखी --पांचवी सीढ़ी के साथ ही 5 हाथ का चांदा  आया हैं --फिर छठीं ,सातवीं ,आठवीं , नवी और दसवीं सीढ़ी एक हाथ ऊंची और एक ही हाथ ऊंची आयीं हैं और लंबी तो उत्तर से दक्षिन दिशा में दो मंदिर की जगह लेकर आयीं हैं --अब देखते हैं दसवीं सीढ़ी के साथ ही पांच हाथ का चांदा शोभित हैं --पंद्रहवीं ,बीसवीं --इस तरह से क्रमशः चांदों की शोभा आयीं हैं 


 5⃣चांदा की शोभा किस प्रकार आयीं हैं  ❓

पांचवी सीढ़ी जो एक हाथ की चौड़ाई लिये आये हैं उसके आगे ही पांच हाथ के चांदा की शोभा आयीं हैं --सीढ़ी और चांदा एक ही लेवल में आएं हैं --पर अद्भुत शोभा तो देखे कि सीढ़ियों पर और चांदा पर भिन्न भिन्न शोभा ,रंग लिये गिलम आयीं हैं तो पांचवीं सीढ़ी जो छह हाथ कि आयीं हैं उनमें सीढ़ी कि शोभा शेष सीढ़ियों के सामान दृष्टिगोचर होती हैं और चांदा की शोभा जुदी दिखाई देती हैं रूहों को ---

 6⃣सीढ़ियों के दोनों किनारों पर कैसे शोभा आयीं हैं विस्तार से कहे ❓

सीढ़ियों के दोनों किनारों पर कठेड़े की शोभा आयीं हैं --प्रत्येक सीढ़ी पर कमर भर ऊंचा कठेड़ा आया हैं और इसी प्रकार चांदों पर भी कमर भर ऊंचा कठेड़ा आया हैं --पूर्व से पश्चिम --अर्थात चांदनी चौक की तरफ से धाम की और कठेड़ा भी चढ़ता हुआ प्रतीत होता हैं --कठेड़े पर अति सुंदर कांगरी सुखदायी झलकार कर रही हैं --कठेडा में अद्भुत चित्रामन आया हैं इन  चित्रामन के सजीव पशु पक्षी मानो मेरे साथ साथ  चढ़ रहे हैं ..पिऊ पिऊ ,तूही तूही की गूंजार --चंहु और 

7⃣निजघर की सौ सीढ़ी बीस चांदे कहा ले जाकर खड़ा करते हैं ❓

100  सीढियां 20  चांदों सहित पर कर धाम दरवाजा के सम्मुख पहुँचते हैं 


8⃣धाम दरवाजे तक पहुंचना हैं तो कैसे पहुंचे ❓

इस प्रश्न का उत्तर विस्तार ---चितवन रूप में 

मेरी रूह तू  चल अपने निजघर

श्रीराज श्यामा जी चरणों में नमन करती मेरी रूह तारतम का मौन जप कर रही हैं | श्री राज जी की मेहर इलम  से मेरी रूह पहुँची --
चाँदनी चौक -रंगमहल के सामने 

मेरी रूह देखती हैं चाँदनी चौक की शोभा 

अमृत वन के तीसरे हिस्से में आया विशाल चाँदनी चौक 

जिसकी पूर्व दिशा में नौ भोंम दसवी आकाशी का रंगमहल सुशोभित हैं 

और तीन दिशा में अमृत वन के वृक्षों की महेराबे  --
और उनमें से झलकते अमृत वन की मनोहारी शोभा दिख रही हैं 

नीचे हीरे ,मोती ,माणिक की तरह बिखरी रेती --अत्यंत ही कोमल --और तेज तो इतना की आसमान तक झलकार कर रहा हैं 
अहो ! नीचे रेती का नूर ,सामने से आता रंगमहल की नूरी जोत और वनो की जोत आपस में टकरा कर सुखदायी प्रतीत हो रही हैं 

चाँदनी चौक के मध्य में नूरी नंगों की रोंस जो पाट घाट से सीधा अमृत वन से होती हुई चाँदनी चौक में होती हुई  रंगमहल की सीढ़ियों तक ले जा रही हैं 

दाईं और देखती हूँ तो कमर भर ऊँचे चबूतरे पर नूरी वृक्ष --दो भोंम की शोभा लिए 
बाईं और ऐसे ही शोभित हरा वृक्ष 

मैं बाईं और जा  रही हूँ --नूर रेती ,कोमल इतनी की मेरे पाँव घुटनों तक धँस रहे हैं ..वो भी पिऊ की आशिक चेतन हैं जो मेरी रूह से बाते करती हैं --रेती का एक एक कण में पिया का अक्श नज़र आया 

मेरी रूह चबूतरे की किनार पर पहुँची 
सुंदर सीढ़ियाँ 
मैं तीन सीढ़ियाँ चढ़ रही हूँ ..
चबूतरे पर पहुँची --नीचे अत्यंत ही कोमल पशमी गिलम

फूल ही फूल बिछे हुए --ठीक मध्य में एक मंदिर का तना
जिसने कुछ इस तरह से अपनी डालियां बढ़ाई कि  उनकी छाया चबूतरे तक ही रहती हैं शीतल छाया --मेरे लिए सुंदर कुर्सियाँ हाजिर --मैं बड़ी ही अदा से विराजमान हुई --अरे साथ मैं आप सब प्यारी सखियाँ भी तो हैं कितने नूरी स्वरूप हैं मेरी सखियों के --
तने में सामने सीढ़ियाँ ..हम ऊपर जा रहे हैं 

वृक्ष की दूजी भोंम--नीचे भी फूलों का फर्श और ऊपर भी फूलों का छतरिमंडल--
फूलों के ही सिंहासन ,सेज्या ,
वृक्ष की तीसरी चाँदनी पर अति सुंदर फूलों का गुमत ,कलश और ध्वजा 
दाई और भी ऐसे ही अत्यंत की मनमोहक शोभा 

अब मेरे श्री राज जी हमे सीढ़ियों की और बुला रहे हैं 
हम वहाँ पहुँचे ..सामने सीढ़ियाँ ,,,हम पहली सीढ़ी चढ़ रहे हैं ,दूसरी --तीसरी --चौथी --और जैसे पाँचवीं सीढ़ी पर आए तो देखी एक प्यारी सी शोभा 
पाँचवीं सीढ़ी के साथ ही पाँच हाथ के चान्दा की शोभा --
दसवी ,पंद्रहवी सीढ़ी पर भी ऐसे ही शोभा --इस तरह से सौ सीढ़ियाँ बीस चाँदों सहित पार कर रही हूँ ...दाएँ बाएँ स्वर्णिम कठेड़े --उनमें आएँ चित्रामन के सजीव पशु पक्षी मानो मेरे साथ साथ  चढ़ रहे हैं ..पिऊ पिऊ ,तूही तूही की गूंजार 

मैं धाम द्वार के सम्मुख पहुँची ---सामने मेरे धाम का द्वार --बादशाही शोभा लिए🙏🏾🙏🏾

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

sou sidhiyaan bis chaande

सीढियां और चांदे

चांदनी चौक के मध्य भाग में पश्चिम तरफ भोम भर की सीढ़ी  रंगमहल के भोम भर ऊंचे चबूतरा पर चढ़ी हैं --सीढ़ियों का उतार चढ़ाव दो मंदिर का आया हैं अर्थात सीढ़ियों ने चांदनी चौक की जमीन से चबूतरा तक दो मंदिर की जगह घेरी हैं --
सर्वप्रथम देखते हैं पहली सीढ़ी--


उत्तर से दक्षिन दिशा में यह सीढियाँ दो मंदिर की लंबी आयीं हैं --चांदनी चौक से पहली सीढ़ी एक हाथ ऊंची और एक ही हाथ चौड़ी आयीं हैं --तो ऐसे पांच सीढ़ी देखी --पांचवी सीढ़ी के साथ ही 5 हाथ का चांदा  आया हैं --फिर छठीं ,सातवीं ,आठवीं , नवी और दसवीं सीढ़ी एक हाथ ऊंची और एक ही हाथ ऊंची आयीं हैं और लंबी तो उत्तर से दक्षिन दिशा में दो मंदिर की जगह लेकर आयीं हैं --अब देखते हैं दसवीं सीढ़ी के साथ ही पांच हाथ का चांदा शोभित हैं --पंद्रहवीं ,बीसवीं --इस तरह से क्रमशः चांदों की शोभा आयीं हैं

विशेष ध्यान देने योग्य बात यह हैं की पांचवीं सीढ़ी और चांदे की जमीन बराबर आयीं हैं लेकिन इनकी बनावट अलग अलग आयीं हैं तो अलग अलग बयान किया जा रहा है --
इस प्रकार से सौ सीढियां और बीस चांदा आएं हैं --इन सीढ़ियों और चाँदों  पर अति सुन्दर गिलम बिछी हैं ,गिलम कई प्रकार की नककसकारी ,चित्रामन सुसज्जित हैं -सीढ़ियों और चाँदों  के स्थान पर गिलम का रंग शोभा अलग आयीं हैं
                        परकोटा कांगरी

इन सभी सीढ़ियों तथा चाँदों के किनारे उत्तर दक्षिण  की दीवार पर  अति सुन्दर कांगरी की शोभा आयीं हैं --एक एक सीढ़ी पर कमर भर ऊंची और एक हाथ की लंबी दीवार आयीं हैं --और इन दीवार के ऊपर अति सुन्दर नंगों से जड़ित कांगरी आयीं हैं --इस प्रकार चाँदों पर भी कमर भर ऊंची दिवार आयीं हैं -और इन दिवार पर भी मनोहारी कांगरी आयीं हैं --यह पूर्व से पश्चिम चढ़ती हुई दिखाई देती हैं
अंत में बीसवें चांदे से एक सीढ़ी और चढ़के दो मंदिर के लंबे चौड़े चौक में आएं है

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

chandni chouk

पहला प्रश्न हैं 

चांदनी चौक की शोभा रंगमहल की किस दिशा में आयीं हैं ?

पूर्व दिशा में --

तो अब एक प्रश्न और आता है दिल में कैसे 

तो साथ जी ,रंगमहल की पूर्व दिशा में सात वन आएं हैं --केल  ,लिबोई ,अनार ,अमृत ,जाम्बु ,नारंगी ,बट 

इनमें से तीन वन अनार ,अमृत ,जाम्बु रंगमहल की पूर्व दीवार से मिलान करते हुए आएं हैं --तो रंगमहल के मुख्य द्वार के सामने अमृत वन के तीसरे हिस्से में चांदनी चौक की शोभा आयीं हैं अर्थात १६६ मंदिर के लंबे चौड़े हिस्से में वन नहीं आकर चांदनी चौक की शोभा हुई हैं

प्रश्न -२--चांदनी चौक की लंबाई चौड़ाई कितनी हैं❓ 


चांदनी चौक की लंबाई चौड़ाई १६६ मंदिर की लंबी चौड़ी आयीं हैं --

प्रश्न -३ --चांदनी के चौक में रूह प्रवेश करती हैं और रूह का मुख धाम द्वार की और हैं तो ठीक मध्य भाग में क्या शोभा आयीं हैं जो रूह को धाम सीढ़ियों के सन्मुख ले जाती हैं ❓


रूह मेरी जब चांदनी चौक में प्रवेश करती हैं ,और मुख धाम द्वार की और हैं तो ठीक मध्य में दो मंदिर की चौड़ी नगन की रोंस हैं जो अमृत वन के मध्य भाग से होती हुई चांदनी चौक के ठीक मध्य से होती हुई धाम की सीढ़ियों तक पहुंचाती हैं
प्रश्न -४--श्री परमधाम को प्रवेश होते दाहिनी (उत्तर )हाथ में चांदनी चौक में क्या शोभा हैं


चांदनी चौक के मध्य रोंस में खड़े हैं तो दाहिनी हाथ में चांदनी चौक की अति निर्मल ,नूरमयी ,मोती की तरह झलकार करती नरम अति नरम रेती में मनोहारी शोभा लिये चबूतरा पर लाल वृक्ष की खुशहाल करने वाली शोभा हैं और किनार पर अमृत वन के वृक्षों की हार ,उनमें आयीं सुंदर मेहराबें और वन के दो भोम के छज्जे
प्रश्न -५--|श्री परमधाम को प्रवेश होते  बाईं तरफ (दक्षिण ) में चांदनी चौक में क्या शोभा हैं


बायीं तरफ लाल वृक्ष के सामान ही हरे वृक्ष की शोभा और चांदनी चौक की बायीं किनार पर अमृत वन की शोभा --
प्रश्न -६--लाल हरे वृक्ष शोभा से सुसज्जित चबूतरों की लंबाई चौड़ाई कितनी हैं 


चांदनी चौक में आएं चबूतरे जिनपर लाल हरे वृक्षों की अपार शोभा आयीं हैं ३३ मंदिर के लंबे चौड़े आएं हैं
 प्रश्न -७--चबूतरे चांदनी चौक की जमीन से कितने ऊंचे हैं


यह चबूतरे चांदनी चौक की जमीन से तीन सीढ़ी ऊंचे सुशोभित हैं                        

प्रश्न -८--चबूतरों की चारों दिशा में घेर कर कठेड़े और सीढ़ियों की  क्या शोभा आयीं हैं?

३३ मंदिर के लंबे चौड़े तीन सीढ़ी ऊंचे चबूतरा की मनोहारी शोभा आयीं हैं --चबूतरा की चारों दिशा से आठ मंदिर की जगह में तीन तीन सीढियां उतरी हैं और घेर कर कठेड़ा आया हैं --चबूतरा के ठीक मध्य भाग में एक मंदिर का मोटा नूरमयी तना उठता हैं --तने की चारों दिशा में द्वार आएं हैं --तो इन द्वारों से तने के भीतर जा सकते हैं ..तने के भीतर भी विशाल विस्तार --सुन्दर शोभा और चढ़ती सीढियां --तो इन सीढ़ियों से चढ़कर वृक्ष की दूजी भोम जाइये -

एक मंदिर का तना ७५  हाथ सीधा ऊपर जाकर हर दिशा में 34 -34  डालियों का विस्तार करता हैं तो पहली भोम में सुन्दर चंदवा,फूलों-पत्तियों  का छत्रिमंडल  --बरामदे मानद शोभा और वृक्ष  की दूसरी भोम मोहोलात की तरह शोभित हैं

 प्रश्न -९--लाल हरे वृक्ष कितनी भोम ऊंचे आएं हैं

दो भोम तीसरी चांदनी                        

प्रश्न -10--चांदनी चौक की पूर्व ,उत्तर ,दक्षिन दिशा में क्या शोभा आयीं हैं ❓?

चांदनी चौक की पूर्व ,उत्तर ,और दक्षिन दिशा में अमृत वन की शोभा आयीं हैं --अमृत वन के नूरी वृक्षों की दो भोम के छज्जे --
 
प्रश्न -10--चांदनी चौक की पश्चिम  दिशा में क्या शोभा आयीं हैं ❓


चांदनी चौक के पश्चिम दिशा में रंगमहल की शोभा हैं --नव भोम दसवीं अकाशी का हमारा रंगमहल --रंगमहल के दस हान्स की शोभा --चढ़ती सीढियां ,धाम द्वार की अलौकिक शोभा

बुधवार, 30 नवंबर 2016

chandni chouk se mulmilave tak

खुद को चांदनी चौक में महसूस कर मेरी सखी --मुख रंगमहल की और --तो मेरी सखी दायीं और लाल वृक्ष की शोभा हैं और बायीं और हरे वृक्ष की --ठीक मध्य में दो मंदिर की चौड़ी रोंस अमृत वन  से आती हुई जो धाम की विशाल सीढ़ियों तक ले जाकर खड़ा करती हैं
 धाम की विशाल अति सोहनी ,सुखदायी सीढियां --हर पांचवीं सीढ़ी के आगे चांदा की शोभा --और दोनों और आएं कठेड़े --
देख तो मेरी प्यारी सखी ,कठेडों के चित्रामन के पशु पक्षी भी उल्लास में गाते बाजाते तेरे तेरे साथ साथ सीढियां चढ़ रहे हैं --मधुर संगीत स्वरों की गूंज --पीया तुहि तुहि तू
सीढियां चढ़ कर दो मंदिर के चौक में आ सखी और देख ---श्वेत महक से महकता चौक --चारों कोनों में हीरा के थम्भ --दो भोम ऊंचा यह चौक हैं --चौक के पूर्व में उतरती सीढिया देखी --उत्तर दक्षिन में एक सीढ़ी ऊंचे दो मंदिर के चौड़े और चार मंदिर के चबूतरा आएं हैं --और ठीक सामने नूरी दर्पण का धाम दरवाजा --हरे रंग की बेनी और लाल रंग की एक सीढ़ी ऊंची चौखट --
द्वार स्वतः ही खुल गए --
एक सीढ़ी ऊंची चौखट को धाम धनि की लाडली दुल्हिन बड़ी ही अदा से पार करती हैं --जैसे ही धाम दरवाजा के मंदिर में प्रवेश करती हैं तो फूलों की बरखा से अभिनंदन हुआ न मेरी सखी --स्वागत में शहनाई वादन --पलक पाँवड़े बिच गए आपकी राहों में --दायीं बायीं के द्वार खुल गए और पाखे के मंदिरों से सखियाँ भी उमड़ पढ़ी --प्यारी सखी से मिल तो लूँ --
 सामने के द्वार को भी उमंग से पार किया और आ पहुंचे मेरे निजघर में ,मेरा रंगमहल
 धाम दरवाजा पार करके मेरी सखी ---तू खड़ी हैं एक गली में ,आने जाने की रोंस में 

रोंस पार कर --अब कहाँ हैं मेरी  सखी ?
अब मेरी सखी ,धनि हमें ले आएं हैं 28  थम्भ के चौक में --
 चौक में अति नूरी गिलम ,कोमलता लिये गिलम और सुंदर बैठके ---पूर्व पश्चिम में रंगों नंगों से झिलमिलाते 10 -10  थम्भ और ऊतर दक्षिण 4 -4  थम्भ 

थंभों को भराए कर छत पर नूरी चंदवा की झलकार

 आओ मेरी सखी ,कुछ देर इन चौक में विश्राम करे ,धनि की बातें करे
28  थम्भ के चौक में कुछ पल विश्राम किया ..अखंड सुखों को याद कर अब मेरी सखी आगे बढ़ते हैं --चौक से जैसे ही बाहर निकले खुद को एक नूर से लबरेज गली में देखा --सामने पहली चौरस हवेली --
पहली चौरस हवेली जो कुछ अद्भुत शोभा लिये हैं --
 पहली चौरस हवेली हमारी रसोई की हवेली हैं --
 गली में हैं हम सखी और सामने रसोई की हवेली --

तो यहाँ से क्या शोभा दिख रही हैं ?

सामने हैं रसोई की हवेली की पूर्व दीवार --अजब शोभा --
21  मंदिर की दीवार जिसमें मध्य में दो थंभों की हार आने से सुंदर दहलान आयीं हैं और दहलान के दाएं बाएं 5-5 मंदिर रंगों नंगों से युक्त सुखदायी झलकार करते दिख रहे हैं
 ग्यारह मंदिर की लंबी एक मंदिर चौड़ी दहलान --दोनों और मंदिर --
थंभों की सुन्दर मेहराबे ,नूरी छत ---में बनी सुन्दर दहलान के दृश्य इन नासूत जिमी में 

👆👆हे मेरी सखी ,रसोई के चौक की पूर्व दिशा की शोभा को दिल में बसा -- नूरमयी जगमगाते थंभों के मध्य अति सुन्दर ,मनोहारी दहलान --दहलान के दोनों और नूरमयी मंदिरों की अपार शोभा
पूर्व की शोभा को निरखते हुए दहलान में होते हुए पहली चौरस हवेली ...निजघर की रसोई की हवेली के भीतर प्रवेश किया --सुगंधि का आलम और चारों और का विहंगम दृश्य --

सबसे पहले मेरी सखी निरख --उत्तर ,दक्षिण और पश्चिम दिशा के मध्य आएं नूरमयी दर्पण के किवाड़ों की शोभा --हवेली के बड़े द्वार जिनकी शोभा तो देख --धाम दरवाजा के सामान सुशोभित यह हवेली के बड़े द्वार 

बड़ा दरवाजा तो पूर्व दिशा में भी होना चाहिए पर क्योंकि वहाँ दहलान आयीं हैं तो मुख्य द्वार नहीं आया हैं
सखी पूर्व दिशा से रसोई की हवेली में प्रवेश कर सर्वप्रथम देखी शोभा --मुख्यद्वारों की --

और अब देखते हैं उत्तर दिशा की शोभा ---आपके दाएं हाथ की और की हवेली की दिवार --

तो देखा सखी ,पहला उत्तर दिशा में पहला मंदिर रसोई का हैं जो श्याम रंग में शोभित हैं --दूसरा सीढ़ी का मंदिर और तीसरा श्वेत मंदिर ,जिनमें सामग्री रखी हैं
उत्तर दिशा में मंदिरों की अति मनोहारी शोभा देखे सखी ---याद करे वह पल --कैसे लाड बाई के जूथ में शामिल हो हम सखियाँ रुच रुच कर धाम धनी श्री राज जी के लिये रसोई के विशाल मंदिर में भोजन तैयार करती हैं --सब इच्छा मात्र से हाजिर हो ..ऐसे नूरी भोम हैं हमारा निजघर ..पर सखियों को सेवा भावे 

रसोई के मंदिर के आगे सीढ़ी का मंदिर --जिनसे  सखियाँ चढ़ उतर करती हैं उन समय उनके आभूषणों की मनोहारी ,अति मधुर आवाज को श्रवण करे 

और आगे श्वेत मंदिर में सभी साजो सामान उपलब्ध हैं
और उत्तर दिशा की मंदिरो की दीवार में ठीक मध्य में नूरी दर्पण रंग का झलकार करता मुख्य द्वार --

देखो मेरी सखी --द्वार से पहले तो मंदिरों की अपार शोभा दिख रही हैं और बड़े दरवाजे  के आगे शोभा कैसे हैं अब वह देखे मेरी सखी --

उत्तर दिशा में आएं  मुख्य द्वार के आगे नूरी दहलान आयीं हैं --इन मुख्यद्वार के आगे पश्चिम की और --जहां दस मंदिर आने थे वहां दहलान की शोभा आयी हैं --इन दस मंदिरों की बाहिरी दीवार तो आयीं हैं पर हवेली के भीतर की और पाखे की दीवार नहीं आयीं हैं --भीतर की और मंदिर -मंदिर के अन्तर पर थम्भ आएं हैं जिनसे सुंदर दहलान की शोभा दृष्टिगोचर होती हैं
उत्तर दिशा की शोभा देखकर सखी अब देखते दक्षिण दिशा की हवेली की दीवार की और --बड़े दरवाजा के पहले तो मंदिर आये हैं और बड़े द्वार के आगे दहलान आयीं हैं --उत्तर दिशा के माफक 

अब देखते हैं पश्चिम दिशा की और --पश्चिम दिशा में इक्कीस मंदिर की अति मनोहारी दीवार खुशहाल कर रही हैं --ठीक मध्य में बड़ा द्वार तो देखे
रसोई के हवेली के चारों और की दीवार की शोभा देखी --अब देखते हैं इन मंदिरों की दीवार के भीतर की और ---देख मेरी सखी एक थम्भ की हार दो गालियां सुशोभित हैं

ठीक मध्य भाग में कमर भर ऊंचा चबूतरा ---

सखी रसोई की हवेली की अलौकिक शोभा दिल में ली --पूर्व दिशा की दहलान --उत्तर दक्षिन दिशा में आयीं अलौकिक शोभा लिये दहलान ,स्याम श्वेत मंदिर की शोभा देखते हुए पश्चिम द्वार से बाहर निकल कर पहली चौरस हवेली ,रसोई की हवेली पार की
हवेली पार कर पश्चिम द्वार से बाहर निकलेंगे तो क्या शोभा होगी हमारे धाम की सखी ?
सखी ,हवेली से बाहर निकले तो देखेंगे --एक गली फिर थम्भ की हार ,फिर गली ,थम्भ की हार पुनः गली --अर्थात दो थंभों की हार तीन गलियां
हवेली के भीतर एक थम्भ की हार दो गली देखी --हवेली से बाहर निकलेंगे तो दो थम्भ की हार तीन गलियां
-- एक हवेली को घेर कर एक थम्भ की हार आती हैं --तो जब दो हवेली एक साथ आती हैं तो दो थंभों की हार तीन नूरी गलियां दिखाई देती हैं
थंभों की दो हार और उनमें आयीं तीन गलियां त्रिपोलिया कहलाती हैं तो इन त्रिपोलिये को पार करके दूसरी हवेली के पूर्व दिशा के बड़े द्वार के सम्मुख पहुंचे
पूर्व दिशा में आएं इन मुख्य द्वार से दूसरी चौरस हवेली के भीतर चले सखी -- भीतर गए तो क्या शोभा देखेंगे ? चारो दिशा में मंदिरों की दीवार आयीं हैं --मंदिरों की दीवार के भीतर एक थम्भ की हार दो गलियां शोभा हैं --और ठीक मध्य भाग में कमर भर ऊंचा चबूतरा हैं जिसकी किनार पर थंभों की दूसरी हार आयीं हैं --चारो दिशा से सीढियां उतरी हैं और शेष भाग में कठेड़े की शोभा हैं तो देखो सखी फेर फेर सम्पूर्ण शोभा रसोई की हवेली के माफक --बस यहाँ दहलान ना आकर मंदिर आएं हैं और श्याम ,श्वेत और सीढ़ी वाला मंदिर इनमें नहीं हैं
शोभा देखते हुए दूसरी हवेली भी पार करते हैं --पश्चिम के द्वार से बाहर निकलें तो फिर त्रिपोलिये की अलौकिक शोभा ..सामने तीसरी हवेली का मुख्यद्वार ---तो इस तरह से शोभा देखते तीसरी हवेली को भी पार किया सखी --चौथी हवेली पार करके जब पश्चिम द्वार से बाहर निकलें तो क्या देखा ?
तो देखेंगे एक अद्भुत शोभा --त्रिपोलिया यहाँ भी सुशोभित हैं पर एक हार थंभों की तो सीधी आयीं हैं और दूसरी गोलाई में --सामने हमारा मूल मिलावा --मुलमिलावे का पूर्व दिशा का द्वार --जो खुल गया हैं अपनी सखी के अभिनन्दन के लिये
तो सखी ,बढ़ते हैं आपणा मूल घर ,मूल बैठक --मुलमिलावा की और -- चौथी हवेली के पश्चिम द्वार से आगे बढ़ते हुए त्रिपोलिये को पार किया जिसमें थंभों की एक हार तो सीधी घुमी हैं दूसरी गोलाई में --
 अब सखी हम सम्मुख हैं पांचवी गोल हवेली --मुलमिलावा -- मुलमिलावा का पूर्व दिशा का बड़ा द्वार खुल गए रूह के लिये --एक हरित रौशनी --खुशहाली का प्रतिक --सखी हमारे अखंड दूल्हा के अखंड सुख - देखो सखी , पूर्व दिशा का दरवाजा हरे रंग में झलकार कर रहा हैं --द्वार की अति उत्साह ,दिल में पिऊ मिलन की चाह ,अपनी मूल बैठक जो धाम धनि हमें दिखने वाले हैं --
भीतर पहुंचे तो देखेंगे की मुलमिलावा की इन गोल हवेली की बाहिरी दीवार मंदिरों की आयीं हैं --घेर कर चौसठ मंदिरों की नूरी जगमगाती दीवार --देखो सखी --चारों दिशा में बड़े द्वारों की अपार शोभा --सतहों मंदिरों की मनोहारी शोभा --
मंदिरों के भीतर की और एक थम्भ की हार और नूर से लबरेज दो गालियां
तो पूर्व दिशा के बड़े द्वार से भीतर प्रवेश कर एक थम्भ की हार दो गालियां पार करके चबूतरे के पास पहुंचे
तीन सीढियां चढ़कर चबूतरा पर आएं और पहले चबूतरे पर कंचन रंग में सिंहासन पर विराजमान श्री युगल स्वरूप श्री राज श्याम जी के चरणों में पहुंचे -उनके श्री चरणों में सिजदा करे --उनके नूरी स्वरूप को धाम ह्रदय में बसाए --
और अब प्रियतम श्री राज श्याम जी की अपार मेहर हमें दिखा रही हैं मूल मिलावा की अलौकिक शोभा
इस नक़्शे चौथी हवेली की पश्चिमी दीवार के मंदिर ..एक हार मंदिरों की सीधी आगे मूल मिलावा की गोल हवेली को घेर कर गोलाई में थंभों की हार --थम्भ मेहराबों सहित आगे हलके पीले रंग में घेर कर आएं मंदिर दर्शाये हैं 👆👆👆
गोलाई में आएँ इन मंदिरों के द्वार एक से बढ़कर एक सुन्दर लग रहें हैं | द्वारों के पल्ले ,चौखट की शोभा वर्णन से परे हैं | पिऊ जी के आशिक अति सुन्दर यह द्वार चेतन हैं जो रूह के आगमन पर स्वतः ही खुल जाते हैं |मंदिरों के दरवाज़ों और किनार पर नूरमयी रत्नों जडित लाल रंग की दोरी सुशोभित हैं | यह दोरी सभी मंदिरों की किनारों पर शोभा ले रही हैं | रूह की नज़र से देख तो सही ,इनकी शोभा अत्यधिक हैं | इन दोरी के साथ साथ सब स्थानों पर कांगरी की शोभा हैं जिनके बीच में चित्रामन सजे हैं |साठो मंदिरों नई नई जुगति से शोभा ले रहें हैं | कहीं फूलों से महकते मंदिर आएँ हैं तो कई जवेरातों से जड़े मंदिर हैं ,कोई कोई मंदिर एक ही रंग में झलकार कर रहा हैं तो दूसरे मंदिर में अनेक रंग रोशन हैं
चौसठ थम्भ मंदिरों के बाहिरी और हैं और चौसठ थम्भ अंदर एवं चौसठ थम्भ चबूतरे की किनार पर हैं |सखी ,एक एक थम्भ को देख -- मानो सूर्य के सामने सूर्य हो | एक एक थम्भ की नक्काशी ,उनका चित्रामन का नूर ,उनका जोत ,रूहों के लिए पल-पल बढ़ रहा हैं | नूर के नूर का क्या वर्णन हो ? थम्भो के मध्य का नूर उल्लासित कर रहा हैं | यह नूर धाम धनी श्री राज जी का लाड़ हैं जो उनकी प्यारी रूह को इश्क ,प्रेम की अनुभूति करा रहा हैं |
अब देख सखी , मूल मिलावे के मध्य में कमर भर ऊँचा चबूतरा सुशोभित हैं |चबूतरे की चारों दिशा में द्वार आएँ हैं |जिनसे तीन तीन सीढ़ियाँ उतरी हैं | चारों द्वारों के मध्य में सोलह-सोलह थम्भ शोभा ले रहे हैं |सोलह थम्भो के मध्य कठेडा आया हैं | इस प्रकार से चबूतरे की किनार पर थम्भो और उनके मध्य कठेड़े की अति मनोहारी शोभा आईं हैं | हे सखी ,इन अलौकिक शोभा को निज नयनों से देख |एक एक थम्भ की शोभा को निहार | उनके मध्य आएँ फूलों से महकते कठेड़े की अनुपम शोभा को धाम हृदय में बसा | फेर फेर शोभा को निरख प्यारी सखी
पूर्व दिशा में पाच के दो थम्भों के दरम्यान आया महेराबी द्वार हरित आभा बिखेर रहा हैं जिनके दोनों और नीलवी के थम्भ शोभित हैं | पश्चिम दिशा में नीलवी के थम्भ आएँ हैं जिनसे नीली महक से जगमगाते द्वार की शोभा बन गयीं हैं | इनके दाएँ बाएँ पाच के नूरी थम्भ शोभा ले रहें हैं | ऊतर दिशा में पुखराज के दवार के दोनों और माणिक के थम्भ है| दक्षिण मे माणिक के द्वार के दोनों और पुखराज के थम्भ आये है | और चारों द्वारों के मध्य में आएँ चारों खाँचों में हीरा, लसनिया, गोमादिक, मोती, पन्ना, परवाल, हेम, नूर, चाँदी, कँचन, पिरोजा और कपूरिया के थम्भ आये है ।रूह थम्भो की शोभा को देख रही हैं | थम्भ के निचली तरफ चार हांस आएँ हैं ,उसके ऊपर आठ और मध्य में थम्भ सोलह हांस का शोभित हैं फिर पुनः आठ और चार हांस क्रमशः आएँ हैं | इस प्रकार से बहुत ही प्यारी जुगति से थम्भो की शोभा आईं हैं |जिनमें कई कटाव हैं कई प्रकार के अनुपम नक्काशी हैं | अलग अलग प्रकार के चित्रामन है और हर चित्र के जुदे ही भाव हैं | देख तो सखी , एक एक रंग का अद्भुत जवेर और उसी में आईं चेतन नक्काशी ,उनके अलग अलग कटाव एक से बढ़कर एक सुंदर हैं | इस प्रकार से रूह ने चारों खाँचों में आएं अड़तालीस थम्भ और उनकी शोभा को फेर फेर निरखा | सोलह थम्भ चारों द्वारों के हैं -यह चौसठ थम्भ चबूतरे पर सुशोभित हैं |
अत्यंत ही सुंदर ,नरम ,चेतन पशमी गिलम (बिछौना)चबूतरे पर बिछी हैं | यह गिलम चबूतरे की किनार पर आएं कठेड़े से जाकर लगी हैं जिसकी शोभा सुखदायी है |प्रियतम श्री राज जी को रिझावन खातिर गिलम एक पल में ही कई रंग रूप धारण करती हैं तो इनके रंग का ,शोभा का वर्णन इन नासूत की ज़ुबान से कैसे हो ?सखी ,एक बड़ी ही खुशहाल करने वाली शोभा देखिए ,दुलीचे को घेर कर श्याम ,श्वेत ,हरित और जर्द (पीला) रंग की अत्यंत ही मनोरम ,तेजोमयी दोरी आईं हैं |नूरी दोरी में कई तरह के कटाव हैं ,कई प्रकार के नूरी चेतन वृक्षों और बेलियों का चित्रामन हैं | जिनमें कई प्रकार के पत्तियाँ और फूलों का जड़ाव हैं | अब श्रीराज जी की मेहर से रूह की नज़र जाती हैं ऊपर की और – एक अति मनोरम शोभा -थम्भों को भराए कर के नूरमयी ,अत्यंत ही सुंदर ,महीन -महीन नक्काशी से सज्जित और मोतियों की लड़ो से शोभित चंद्रवा आया हैं |चन्द्रवा के मध्य में भाँति भाँति की चित्र कला चित्रित हैं |चबूतरे की किनार पर आएं थम्भ ,उनकी महेराबे ,थम्भों पर शोभित चंद्रवा ,नीचे नूरी ,नरम दुलीचे की जोत ,उनकी तरंगे आपस में युद्ध करती हुई मनोरम प्रतीत हो रहीं हैं |
चबूतरे के मध्य में सहस्त्र पाँखुड़ी के कमल के फूल पर कंचन रंग के सिंहासन की शोभा हैं ।जिसमें छः पाये छः डांड़े आएँ हैं | जिन पर अद्भुत चित्रामन जगमगा रहा हैं और उन पर नूरी ,चेतन फूल खिले है | एक एक डांड़े में दस दस रंग जवेरो के झलकते हैं |(मोती ,रतन,माणिक ,हीरे ,हेम ,पाने पुखराज ,गोमादिक ,पाच पिरोजा ,प्रवाल ) | दोनों स्वरूपों के ऊपर दो नूरी फूलों की शोभा लिए छत्र सुशोभित हैं | दो कलश तो इन छत्रियों पर हैं और छः कलश घेर कर आए हैं | यह आठ कलश हेम ,स्वर्ण के हैं जो आत्मा को अति प्यारे लगते हैं |छत्री की अद्भुत ,झलकार करती हुई शोभा – जिनमें कई रंग नंग हैं और किनारे भी नंगों की जोत से जगमगा रहे हैं | छत्री में कई प्रकार की सोहनी दोरी ,बेलियाँ और चारों और फिरती नूरी कांगरी अति खुशहाल करती हैं | पिछले तीन डांड़ो के मध्य दो तकिए हैं |जिन पर भी अनेक प्रकार की कई सूक्ष्म अत्यंत ही मनोहारी चित्रण हैं |चारों थम्भो पर चारों ओर से चढ़ती कांगरी सुशोभित हैं | कांगरी में कई प्रकार के नूर से भरे फूल ,पत्ते ,बेलें और महीन कटाव आएँ हैं | सिंहासन पर एक गादी दो पशमी चाकले और दो तकिये पीछे दो दाएँ -बाएँ और मध्य मे एक तकिया रोशन है |श्री राज जी श्री ठकुरानी जी दोऊ चाकले पर विराजमान हैं |श्रीराज जी का बाँया चरण नूर की चौकी पर और दाँया चरण बायी जाँघ पर सोभित है |श्री श्यामजी दोनो चरण कमल नूर की चौकी पर रख अद्भुत छब से विराजमान हैं |सखी मेरी ,युगल स्वरूप श्री राज श्याम जी के चरणों की शोभा को अपने धाम ह्रदय में बसा --एक पल के लिये भी पलक न बंद कर - श्री राज श्याम जी के नूरी चरण कमलों की शोभा ,स्वरूप को निरख